जन्म साखी|
हजूर तेजा सिंह जी महाराज जी|
(सैदपुर वाले)
साखी बाल लीला की चली
जब मैं गाँव लोले हजूर की बुआ संती जी के पास हुजूर के पहले साल का हाल लिखने के लिए गया तो बीबी संती जी ने मुझे दूर से ही पहचान लिया कर और अपनी बड़ी बहु को कहा कि चारपाई लाकर उस पर अच्छे-अच्छे कपड़े को बिछा दो। ज्ञानी जी आए हैं जब मैंने सत्-श्री-अकाल बुलाई तो सभी सत्-श्री-अकाल बुला कर मेरे पास बैठ कर राजी-खुशी पूछने लगे। बीबी संती ने रोटी, पानी के लिए पूछा। मैं तो मना ही करता रहा लेकिन इतने में बीबी गुरो रोटी तैयार करके ले आई। फिर मैंने खाना खाकर बीबी संती को कहा, बीबी जी, मुझे हुजूर महाराज तेजा सिंह जी के पहले साल का हाल लिखवा दो। कोई बात कम ज्यादा न हो। हम यह हुजूर तेजा सिंह जी की जन्म साखी लिख रहे है। जो कि महान पुरुषों का जीवन दुनिया से अनमोल व अप्राप्तीय है।
एक महान पुरुष का जीवन-चरित्र हजारों पुरुषों को महापुरुष बनाता है और जो अभिलाषी जीव होते हैं वे महापुरुषों के जीवन को ग्रन्थ समझ कर पूजते हैं। इसलिए इस जीवन में सही-सही ब्यान होना चाहिए।
फिर बीबी सन्ती जी ने कहा, अच्छा भाई जी मैं भी इस बात पर राजी हूँ कि ठीक-ठीक ही लिखो चाहे थोड़ी बाते ही क्यों न हों। मुझे इनकी बाल-लीला का पूरा पता है। क्योंकि मैं गाँव लोले बहुत कम जाती थी। ज्यादातर मैं सिधवी ही रहती थी। जब हुजूर सवा महीने के हुए तो मैं थोड़े दिनों के लिये गाँव लोले गई। जब सात दिन हुए तो वीर हरी सिंह मुझे जाकर ले आया। जब मैं सिधवी आई तो भाभी जी खाना बना रहे थे। तो हुजूर को पलंग पीड़े पर लेटे हँसते देख कर मैं बहुत खुश हुई और उठा कर गले से लगाया। और भाभी जी से पूछा कि मेरे जाने के बाद उदास तो नहीं हुआ। भाभी जी ने कहा कि, नहीं बीबी जी इस बालक को वाहिगुरु ने इतनी खुशी बख्शी है कि आज तक हमने इनका गुस्से वाला चेहरा कभी नहीं देखा। चाहे हम उठाएँ या न उठाएँ यह हँसते ही रहते हैं। चाहे कोई अंजान भी आकर उठा ले फिर भी हँसते ही रहते हैं।style="color: red;">फिर मैंने कहा भाभी जी, आप काके को उठा लो मैं खाना पकाती हूँ। चाहे यह रो कर दूध नहीं माँगते फिर भी आप इनका ख्याल रखो। समय पर इनको दूध पिलाओ व स्नान करवाया करो। जब हुजूर थोड़ा-थोड़ा चलने लगे तो सभी इनके साथ बहुत प्यार करते थे। साथ ही हमारे आँगन में वृक्षों की छाँव देख कर सभी पड़ोसिनों ने भी यहाँ आकर बैठे जाना तथा हुजूर उनको इतने प्यारे लगते कि उन्होंने अपने बच्चों को उतार कर भी इन्हें उठाए रखना। और कहना कि इसको देखकर दिल नहीं भरता।
जब आप आठ-नौ महीने के हुए तो ऐसा लगता था कि डेढ़ साल के हो. साथियों से दुगने लगते थे। हमारे घर दूध घी की भी कोई कमी नहीं थी। हर तरफ से मालिक की दया थी। हाथों में कंगन और पाँव में पोंटे डालकर जब चलते थे, तब मूर्ति की तरह अच्छे लगते थे। दिल करता था कि देखते ही रहे।