बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

JANAM SAKHI HUZUR MAHARAJ BABA TEJA SINGH JI TRUST SAIDPUR DISTT...AMRITSAR

                           JANAM SAKHI                                    HUZUR MAHARAJ BABA TEJA SINGH            TRUST SAIDPUR DIST.AMRITSAR(P.B)

                                      जन्म साखी|

                        हजूर तेजा सिंह जी महाराज जी|                                                                            (सैदपुर वाले)

                    

                                    राधा-स्वामी दयाल की दया, राधा स्वामी जी सहाय।

                              

                               श्लोक:- दंडवत बंधन अनेक बार सरब कला समरथ।

                                             डोलन ते राखहु प्रभु नानक दे कर हथ ।। 

जब कभी उस वाहिगुरु अकाल पुरुष की महान कृपा होती तो हम हजूर सन्त तेजा सिंह जी के दर्शन करने के लिए जाते थे। हजूर की दिन-रात की बंदगी और निम्रता देखकर सभी पुराने एवं नए सत्संगियों की उमंग थी कि हम हजूर को अट्ठाईस (28) साल श्री गुरु तेग बहादुर की तरह गुफा में बैठकर लगातार उस नाम का रस लेते हुए देखते हैं इसलिए इनका इतिहास जरूर लिखना चाहिए और मैं भी कहता था कि जरूर लिखना चाहिए पर सभी का ख्याल यह था कि ज्ञानी जी ही लिखेंगे। लेकिन मैं कहता था कि कोई समझदार पुरुष ही लिखे। क्योंकि मैंने पहले कभी कोई इतिहास नहीं लिखा। इसलिए मैं झिझकता था, पर भाई संता रिं वालों और वडाले वाले ने बहुत जोर दिया और कोशिश की, कि ज्ञानी स इतिहास की सेवा आपने ही करनी है, फिर आपके लिखने के बाद कोई सथाना इसको असली महनों में ले आयेगा। मैंने फिर कहा भाई संता सिंह जी कमाई वाले महापुरुषों का जीवन कोई कमाई वाला ही लिख सकता है।भाई संता सिंह ने कहा, यह तो ठीक है पर जितनी भी सेवा करोगे, आप जी का इतिहास में नाम रहेगा। करने वाले तो वे आप ही हैं, जिनकी यह सम्धी है, आपने तो मेहनत करनी है। फिर संगत की उमंग के कारण दास को यह सेवा का मौका मिला।दूसरे दिन, हजूर महाराज सुबह नौ (9) बजे गुफा में से उठ कर बाहर लॉन में संगत को दर्शन देते थे। जब हुजूर महाराज गुफा में से उठकर बाहर कुर्सी पर बैठे तो भाई संता सिंह ने हाथ जोड़कर बेनती की, कि हे सच्चे पातशाह जी। हमारी एक अरज है। हजूर कहने लगे, कहो भाई संता सिंह क्या अरज है।संता सिंह-हम हुजूर के हुक्म से, हुजूर की जन्म साखी लिखना चाहते हैं।


हुजूर-अच्छा भाई संता सिंह जैसे आपकी मर्जी है, कर लो पर एक बात जरूरी है, हमारा थोड़ा ही हाल लिखना सारी महिमा सत्गुरु सावन सिंह जी की लिखनी है

संता सिंह-हुजूर । सही-सही हाल तो जरूरी ही लिखना पड़ेगा

हुजूर-फिर भी सत्गुरु सावन सिंह जी की महिमा लिखनी, तो हमने कहा, अच्छा जी। इतनी विनती कर के हम बैठ गए और हुजूर ने हुक्म किया कि जो पुराने सत्संगी शुरू से हमारे साथ रहे हैं वह जैसा लिखवाते हैं, लिख लो। फिर हम बैठ गए। हुजूर ने दरबार साहिब की वाणी का एक शब्द पड़ा इतने में हुजूर का समय पूरा हो चुका था, जो कि आधा घंटा बाहर कुर्सी पर बैठते थे। फिर हुजूर अंदर गुफा में चले गए। संगत दर्शन करके अपने-अपने घर चली गई। दूसरे दिन मैं फिर हुजूर के दर्शन करने के लिए डेरे आया उस डेरे का खु नाम है। डेरा बाबा तेजा सिंह जी महाराज, गाँव सैदपुर डाकखाना महिरामपुरा, तहसील व जिला अमृतसर| यह डेरा एक तरफ इलाका जड़ियाला बुरारी स्टेशन व टांगरे से तकरीबन 5 मील पहाड़ की तरफ है। और दूसरी तरफ महिता चौक से अमृतसर वाली सड़क पर नाथ की खुही (गाँव चनराके) से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर है। इस स्थान पर बैठ कर अगले दिन 9 वैसाख 2099 बी० मुताबिक 1953 ईस्वी 20 अप्रैल को लिखनी शुरू की।जब हुजूर ने हमारी यह अर्ज मंजूर की तो फिर हम कई बार सिघवीं जाकर हुजूर के साथियों से पूरा पता लेते रहे, कि उनकी रहन-सहन किस तरह का था। बाकि पूरा-पूरा पता हमने लोले ढपईया जाकर हुजूर की बुआ संती जी से कच्चे कागज पर लिख ले आये। जो कि फिर डेरे आकर लिखा।

                            जन्म हुजूर महाराज जी|

गाँव सिधवां तहसील जिला अमृतसर में है। रेलवे स्टेशन जैंतीपुर स लगभग (3) तीन मील चढ़ती ओर है। गांव सिंधवां तहसील जिला अमृतसर के जमींदार पिता हरी सिंह जी और माता मान कौर जी की कोख से हुजूर महाराज सन्त तेजा सिंह जी ने संवत् विक्रमी 1956 मुताबिक 1899 ईस्वी 20 आषाढ़ 3 जुलाई दिन मंगलवार सुबह चार बजे अवतार धारण किया।सुबह दिन का उजाला हुआ तो जिस भाई-बहन ने सुना, सभी पिता हरी सिंह जी को बधाई देने आए और पिता हरी सिंह जी ने सबका स्वागत किया में और सभी को भोजन खिला कर और गरीबो व लागीयों को मुँह माँगा दान ये। किया और खुश करके भेजा। पिता हरी सिंह जी सिधु गोत्र के जमींदार थे। गाँव में बड़े सेठ व साहुकार व व्यापार का काम करते थे। जब सब लागी खुशिया मनाते हुए अपने घरों को खुशिया करते हुए चले गए और दिल में खुशी समा न सके। और एक-दूसरे को कहते कि यह कोई अच्छे कर्मों वाला बालक प्रगट हुआ है, जिसकी खुशी पर हमें मुँह मौगा दान मिला है।फिर पिता हरी सिह जी गुरुद्वारे जाकर ग्रन्थी बाबा को लेकर घर आए तो हुजूर की बुआ संती जी ने पलंग पर अच्छे-अच्छे कपड़े बिठा कर ग्रन्थी बाबा जी को बिठाया। उस दिन बुआ संती जी सिधवी ही ये जो कि गाँव लोले (जिसका नया नाम बदल कर दशमेश नगर हो गया है। उपई ब्याही हुई थी। यह सारी बुआ सारी साखी बुआ जी ने बतलाई। फिर बुआ जी ने ग्रन्थी जी को पलंग पर बिठा कर एक थाल बताशों का पाँच रुपये व बिस्तर आगे रख कर दंडवत प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनती की "बाबा जी इस बालक की जन्म-पत्री लिखो जी" तो बाबा ग्रन्थी ने कच्चे कागज पर मोटी-मोटी बातें लिखी और बुआ संती जी से पूछा कि उस वक्त क्या समय होगा। तो बुआ जी ने कहा कि उस समय का हमें पूरा-पूरा पता नहीं, पर याद है कि उस समय मुर्गे ने पहली बांग दी थी। तब ग्रन्थी बाबा ने कहा ठीक है, जब मुर्गे ने पहली बांग दी थी, उस समय में स्नान करने के लिए कुंए पर जा रहा था। तब सुबह चार बजे का समय था। यह पूरा-पूरा दिन संवत, शगुन मुहुर्त लिखकर ग्रन्थी ने कहा कि जन्म पत्री बन गई है। अगर आपने कोई ज्यादा काम करवाना है तो किसी पंडित के पास जाकर करवा लेवे। तो पिता हरी सिंह जी ने कहा बाबा जी जो आपने लिख दिया ठीक है हमने बहुत वहम में नहीं पड़ना। हम तो उस वाहिगुरु के सिक्ख हैं। उसी के भरोसे पर काम करते हैं। इतनी बात कह कर बाबा ग्रन्थी गुरुद्वारे चला गया। जब हुजूर (13) तेरह दिन के हुए तो हमने फिर ग्रन्थी को घर बुलाया। कड़ाह-प्रसाद की देग तैयार की और सब भाई-चारे को लंगर खिलाया। बाबा संत जी ने अमृत बनाया जो सब ने पीया। फिर बुआ संती जी ने कहा, बाबा जी इस बालक का नाम रख दो।

ग्रन्थी-बीबी जी। जब आप श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ कराओगे तब उसमें से गुरबाणी का वाक लेकर इस बालक का नाम रखेंगे ।


फिर उसी वक्त पिता हरी सिंह जी ग्रन्थी बाबा के साथ जाकर गुरुद्वारा से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की देह घर ले आ। हम सारा परिवार एवं नगर निवासी भाई-बन्धु गुरुवाणी सुनने के लिए बैठे थे तो ग्रन्थी बाबा ने दरबार साहिब का प्रकाश किया जब गुरुबाणी का वाक्य लिया तो यह वचन हुआ-
                                        

                                  जन्म मरन दोऊ मे नाही, जन पर-उपकारी आए। 

                                जीव दान दे भगती लाइनि, हरि, सिञ्जु लैन मिलाए ।।

 जब दरबार साहिब का वाक हुआ तो ग्रन्थी ने कहा, भाई जी। आपके बालक का नाम बड़ी तेज रौशनी वाला व गुरुमुखों का नाम है। इस बालक का नाम (तेजा सिंह) रख लो। हमने उसी दिन से हुजूर का नाम तेजा सिंह बुलाना शुरू कर किया।

फिर भाई ग्रन्थी ने सवा महीने बाद दरभार साहिब को भोग डाला। उस समय विवाह से भी ज्यादा दुनिया इकट्ठी हुई, और धूमधाम से रौनक हुई, वह खुशियों से भरा दिन ऐसा लगता है, जैसे मैंने आज ही देखा है।

 

                                    यह साखी पूरी हुई। बोलो भाई जी राधा स्वामी ।





 















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जन्म साखी| हजूर तेजा सिंह जी महाराज जी सैदपुर वाले (साखी बाल लीला की चली)

                                                                         जन्म साखी|                               हजूर तेजा सिंह जी महाराज ज...